सोमवार, 26 मार्च 2018

दो रचनाएँ ' पहली किरन ' से -----


हम चले जाएँगे
  *******
हम चले जाएँगे
पर, थोड़ा सा
रह जाएँगे यहीं

भोर किरन जब
ओस कणों को छूने आएगी
मंद समीरण किसी
डाली को गले लगाएगी
जब अम्बर में पंछी की
कोई टोली मंडराएगी
हम भी होंगे
 वहीं कहीं
थोड़ा थोड़ा, यहीं कहीं  

हम चले जाएँगे पर –
बारिशों में धरती की
भीनी सुगंध
झूमती-गाती
किसी तितली की उमंग
 विरह गीत में उठती
कोई मीठी चुभन
याद दिलाएगी मेरी  
कभी –कभी
थोड़ी थोड़ी,वहीं  कहीं |

नभ के तारों से पूछ लेना
मेरा पता
स्वप्न छाया सी संग-संग
रहूँगी सदा
न देना तब यादों के
दीपक बुझा
लौ सी आ जाऊँगी कभी
थोड़ी थोड़ी,वहीं  कहीं

शशि पाधा ( पहली किरन से)


      आभास
        **
चुभती पीड़ा का आभास
है तुझे भी , मुझे भी
कुछ बुझा-बुझा अहसास
है तुझे भी और मुझे भी|

हर लम्हा टूटे रिश्तों को
हम तोड़ा जोड़ा करते हैं
इन रिसते- भरते ज़ख्मों को
यादों से भिगोया करते हैं
  रूठी चाहत का मलाल
  है तुझे भी और मुझे भी |

अँखियों के कोरों में अब तक
कुछ पल समेटे रखे हैं
यादों की घनेरी छाँव तले
कुछ गीत सजीले रखे हैं

बिखरे सपनों का अंदाज़
है तुझे भी और मुझे भी|

अनबोले बोलों में जीती
अनजानी सी कहानी है
सूनी अँखियों में बसती
तस्वीर वही पुरानी है

मौन होठों का आघात
है तुझे भी और मुझे भी|

हर शाम चारों ओर कहीं
सन्नाटे बोला करते हैं
इन जलते बुझते तारों में
अरमान हमारे पलते हैं

घुटी-घुटी  इक आस
है तुझे भी और मुझे भी |

शशि पाधा ( प्रथम संग्रह ‘ पहली किरन’ से )

  


शनिवार, 17 मार्च 2018

सिमरन कौर का पत्र --शौर्य गाथाएँ


Hello mam...

You don't know me.. I'm a final year student (B. Com Honors) from Jammu. Arvinder Sir gave me your book (shaurya gathaye) a few months back. I had stopped reading Hindi books after school. Reading your book reminded me how beautiful a language Hindi is... And the content... Mind blowing... We all love Indian Army and respect what they do....but Shaurya Gathaye gave a detailed account of their lives... The glimpses of their personal lifes were awe-inspiring... I'm an emotional person but I've never cried while reading a book.. Yours was the first book that made me cry... I recommend it to all my friends.. Army men are great.. No matter what we can never understand what they feel... But your book brings a person as close as they can in understanding their pain... Its simply awesome..... Thank you for writing such a beautiful book... 😘

सिमरन कौर 

गुरुवार, 15 मार्च 2018

मेरे काव्य संग्रह 'अनंत की ओर ' पर वरिष्ठ कवयित्री देवी नागरानी जी के स्नेहिल उद्गार ----


मित्रों, मेरे काव्य संग्रह 'अनन्त की ओर' के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करतीं विशिष्ट साहित्यकार 'देवी नागरानी | एक बार फिर से धन्यवाद देवी जी |
मानवीय जीवन की अंतरंगता और कोमलता की अभिव्यक्त्ति-- "अनन्त की ओर"
अनंन्त की ओर उड़ते परिंदों की गति और कवि मन की सृजनात्मक उड़ान में क़लम की रवानी कुछ ऐसे शामिल हुई है कि पढ़ते हुए लगता है जैसे ज्ञान नि:शब्दता के दायरे में क़दम रख रहा हो। शब्द-शिल्प सौंदर्य को लिए हुए जम्मू नगरी के पर्वतों की गोद में पली बढ़ी रचानाकार शशि पाधा जी अब अमेरिका में निवास करते हुए उसी प्राकृतिक सौंदर्य की वादियों में अपनी सशक्त लेखनी की रौ में हमें बहा ले जाती है, जहाँ उनकी शब्दावली खुद अपना परिचय देती हुई हमसे इस क़दर गुफ़्तार करती है कि उनसे अजनबी रह पाना मुश्किल है. सुनिये और महसूस कीजिये "पाती" नामक रचना का अंश....
"
हवाओं के कागद पर लिख भेजी पाती
क्या तुमने पढ़ी ?
न था कोई अक्षर
न स्याही के रंग
थी यादों की खुशबू
पुरवा के संग---"
इस रचना की तरलता और संगीतमय आलाप इतना मुखरित है कि खामोशी भी चुप है. कोमल भावनाओं की कलियाँ शब्द तार में पिरोती हुई हमारे साथ-साथ सुगंधित खुशबू ओढ़े "अनन्त की ओर" चल रही कवयित्री शशि पाधा जो अपने सृजनात्मक संसार में कुछ इस तरह डूबकर लिखती हैं कि उसकी रवानी में पाठक खुद-ब-खुद डूबता चला जाता है । इस संग्रह के प्रवेशांक पन्नों में माननीया पूर्णिमा वर्मन जी लिखती हैं "अपनी इस निर्भय गति में वह काव्य की अनंत दिशाओं की ओर बहती जाती हैं । सूरज और चांद उनके गीतों में सुख-दुःख के रूप में चित्रित हुए हैं लेकिन सुख-दुःख के ये दिन रात उनके जीवन को रोके नहीं रोक पाते, विचलित नहीं करते, वे साक्षी रूप में उन्हें देखती हैं, वे बिना किसी झिझक और रुकावट के जीवन के अग्नि पथ पर आगे, और आगे बढती जाती हैं" । उनकी बानगी की सरलता में उनके भाव किस क़दर हमें अपनाइयत के दायरे में लेते हैं....
"
एकाकी चलती जाऊँगी !
रोकेंगी बाधाएँ फिर भी
बाँधेंगी विपदाएँ फिर भी
पंथ नया बनाऊँगी, एकाकी चलती जाऊँगी । "
विश्वासों के पंख लगा कर, वायु से वेग की शिक्षा लेकर, उल्काओं के दीप जलाकर, जीवन पर्व मनाती हुई वे जीवन की पगडंडियों पर चलने का निष्ठामय संकल्प लेकर कठिनाइयों के पर्वतों से अपना रस्ता निकाल लेती है । यहाँ मुझे कैनेडा के कवि, गज़लकार, व्यंगकार समीर लाल की पँक्त्ति याद आ रही है ---
"
रंग जो पाया उसी से ज़िन्दगी भरता गया,
वक्त की पाठशाला में मैं पढ़ता गया"
सच ही तो है जीवन की पाठशाला में पढ़कर सीखे हुए पाठ को ज़िन्दगी में अपनाने का नाम ही तज़ुर्बा है । उन्हीं जिये हुए पलों के आधार पर काव्य का यह भव्य भवन खड़ा है जो शशि पाधा जी ने रचा है ।यहाँ गहन ख़ामोशी में उनके शब्दों की पदचाप सुनिए--
"
शब्द सारे मौन थे तब/ मौन हृदय की भावनाएँ
नीरवता के उन पलों में नि:शब्द थीं संवेदनाएँ "
यह मस्तिष्क की अभिनव उपज के बजाय मन की शीतलता का निश्चल प्रवाह है। शब्दावली भावार्थ के गर्भ में एक सच्चाई छुपाए हुए है जो आत्मीयता का बोध कराती जाती है. । उनकी रचनाधर्मिता पग-पग पर मुखरित है । हर मोड़ पर जीवन के महाभारत से जूझते-जूझते, प्रगति की राह पर क़दम धरती, पराजय को अस्वीकार करती अपनी मज़िल की ओर बढ़ते हुए वे कहती हैं-
"
सागर तीरे चलते -चलते/ जोड़ूँगी मोती और सीप
लहरों की नैया पर बैठी/ छू लूँगी उस पार का द्वीप"
निराशा की चौखट पर आशाओं के दीप जलाने वाली कवयित्री अपने वजूद के बिखराव को समेटती, एक लालसा, एक विरह को अपने सीने में दबाए अपने मन की वेदनाओं को कैसे सजाती है, महसूस करें इस बानगी में ---
"
कैसे बीनूँ, कहाँ सहेजूँ
बाँध पिटारी किसको भेजूँ
मन क्यों इतना बिखर गया है "
उनकी हर एक रचना शब्द के द्वार पर दस्तक है । भावनाओं का संवेग जब शब्द के साँचे में ढलता है तब सृजन का दीप जलता है, शब्द के सौन्दर्य में सत्य का उजाला प्रतीत होता है, क़लम से निकले हुए शब्द जीवंत हो उठते हैं, बोलने लगते हैं. मन से बहती काव्य सरिता, श्रंगार रस से ओत-प्रोत आँखों से उतर कर रूह में बस जाने को आतुर है ---
"
नील गगन पर बिखरी धूप/ किरणें बाँधें वंदनवार
कुसुमित/शोभित आँगन बगिया/चंदन सुरभित चले बयार "
शशि जी का सुगन्ध के ताने बाने से बुना हुआ यह गीत "चंदन गंध" पढ़ते ऐसा लगता है जैसे शब्द सुमन प्रेम की तारों में पिरो कर प्रस्तुत हुए हों, ऐसे जैसे आरती का थाल सजा हो, जिसमें प्रेम की बाती हो, श्रद्धा का तेल जला हो. अपने प्रियतम की आस में आकुल-व्याकुल यौवन मदहोशी के आलम में दर्पण से मन की बात कह कर उसे अपना राज़दार बना रहा यह गीत देखिए---
"
न तू जाने रीत प्रीत की, न रस्में न बंधन
न पढ़ पाए मन की भाषा, न हृदय का क्रंदन"
शशि जी को पढ़ कर उनके जीवन, चरित्र और स्भाव का हर पन्ना खुलता जाता है, जो उन्होने जिया, उसका चिंतन करने के पश्चात लिखा, जो देखा भोगा वह अनुभव बनकर उनके व्यक्तित्व का अंग बन जाता है. उसी विचार मंथन की उपज है ये शब्द सुमन की कलियाँ.............
"
उलझ गई रिश्तों की डोर
बाँध न पाए बिखरे छोर
टूटा मन का ताना बाना
शब्द गए सब हार"
संवेदना के धरातल पर अलग अलग बीज अंकुरित होते हुए दिखाई पड़ते हैं. शब्दों की सरलता, भाव भीनी भाषा, सहज प्रवाह में अपनी भावनाओं को गूंथने वाली मालिन शशि पाधा जी पाठक को अपनाइयत के दायरे में ले ही लेती हैं। ऐसे में कोई कहां अजनबी रह पाता है उनकी आहट से !!
"
ताल तलैया पनघट पोखर, गुपचुप बात हुई
गीतों की लड़ियों में बुनते , आधी रात हुई"
इनके काव्य सौन्दर्य - बोध को परखने के लिए भावुक पारखी हृदय की आवश्यकता है. यह वह गुनगुनाहट है जो अपने आप अंदर से निकल कर फूट पड़ती है, रास्ते के सन्नाटों में या सुबह होने से पहले की निस्पंदता में, ऐसे जैसे रात को जंगलों से गुज़रते हुए रात की खामोशी गुनगुनाती हो. प्रकृति और प्रेम से जोड़ता हुआ उनका रचनात्मक एवं कलात्मक सौन्दर्य देखिए इन पंक्त्तियों में--
-"
स्वर्ण पिटारी बाँध के लाई/ अंग-अंग संवारे धूप
किरणों की झांझर पहनाई, सोन परी सा सोहे रूप"
शशि पाधा की रचनाएँ ताज़ा हवा के नर्म झोंके की तरह ज़हन को छूती हुईं दिल में उतर जाती हैं प्रकृति चित्रण और प्रेम की कविताएँ चित्र को रेखाँकित करने में पूर्णता दर्शातीं हैं और अन्त:चेतना के किसी हिस्से को धीमे से स्पर्श करती है. जैसे--
"
नीले अम्बर की थाली में / तारक दीप जलाता कोई
उल्काओं की फुलझड़ियों से / दिशा -दिशा सजाता कोई "
इनके रचनाओं में कर्मठ कथ्य के तेजस्वी बयान मौजूद है...
"
पंख पसारे उड़ते पंछी/ दिशा-दिशा मंडराएँ
किस अनन्त को ढ़ूँढे फिरते/ धरती पर न आएँ"
शशि पाधा जी की कल-कल बहती काव्य सरिता में मानव मन एक अलौकिक आनंद से पुलकित हो उठता है । इस काव्य संग्रह की हर रचना उल्लेखनीय है पर उस देस से इस देस की पीड़ा को अभिव्यक्त्त करती उनकी यह पंक्त्तियाँ मेरे मन के प्रवाह को भी नहीं रोक पाती----
"
छूटी गलिय़ाँ, छूटा देश
अन्तर्मन उदास आज"
इस अनूठे काव्य संग्रह की हर रचना मन को उकेरती है और अपनी छवि बनाती हुई मन पर अमिट छाप सक्षमता के साथ छोड़ती है । इन सुरमयी, सुगंधित रचनाओं का यह संकलन संग्रहणीय है। शशि पाधा जी को इस भाव भीनी अभिव्यक्ति के लिये मेरी दिली शुभकामनाएँ और बधाई.
देवी नागरानी




बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

मानस मंथन : हमारी धरोहर----बुग्दियाँ ...

मानस मंथन : हमारी धरोहर----बुग्दियाँ
...
: हमारी धरोहर ----बुग्दियाँ इस तस्वीर को ध्यान से देखें| इसमें एक गुज्जर युवती ने चा...
हमारी धरोहर ----बुग्दियाँ

इस तस्वीर को ध्यान से देखें| इसमें एक गुज्जर युवती ने चाँदी में जड़े बहुत से सुंदर आभूषण पहने हैं| आज भी इसी प्रकार के आभूषणों का चलन है और इन्हें आधुनिक फैशन माना जाता है| मेरे बचपन की मधुर स्मृतियों की पिटारी में एक बहुत खूबसूरत याद है  ‘बुग्दियाँ’| बोलने में जितना खूबसूरत यह शब्द है उतना ही खूबसूरत यह गहना होता था| इस तस्वीर में इस गुज्जर युवती ने एक माला पहनी है जिसमें चाँदी के सिक्कों को धागे में गूँथा हुआ है| अगर आप अन्य दूसरी मालाओं से ध्यान हटा कर केवल सिक्कों की माला को देखेंगे तो समझ जायेंगे कि मैं किस गहने की बात कर रही हूँ| आज मैं इन्हीं सिक्कों की माला के विषय में अपनी स्मृतियों को आपके साथ साझा कर रही हूँ|
२०वीं शताब्दी में डुग्गर प्रदेश की अधिकतर महिलाओं के पास सिक्कों जैसी आकृति से गूँथा एक हार अवश्य होता था और आम भाषा में इसे ‘बुग्दियाँ’ कहा जाता था| यह सिक्के सोने के होते थे जिन्हें शायद ‘गिन्नी’ भी कहा जाता था| एक मोटे काले धागे में बराबर की दूरी पर इन बुग्दियों को गूँथा जाता था| धनी महिलाओं के पास दस- बारह बुग्दियों वाला हार होता था| यह आकार में छोटी या बड़ी भी होती थीं यानी जिसके पास जितना धन हो|
हमारे परिवार में भी एक बुज़ुर्ग महिला थीं जिन्हें हम ‘बेबे’ कह कर बुलाते थे| हमारी माँ अध्यापिका थीं अत: हमारा बचपन अधिकतर ‘बेबे’ की गोद में ही व्यतीत हुआ था| मैंने अपने बचपन में उनके पास यह गहना देखा था| कभी भी अगर उनके पास कुछ ज़रूरत से अधिक पैसे होते तो वो मेरे पिताजी से कह कर अपनी बुग्दियों की माला में एक और बुग्दी जोड़ने के लिए सुनारों के पास भेजती थीं| उनकी बुग्दियों का आकार पुराने ‘नये पैसे’ जितना होता था| सोने के तोल के हिसाब से ही इन्हें बड़ा या छोटा बनाया जाता था| उन दिनों सोना भी तो –तोला , माशा , रत्तियों के हिसाब से तोला जाता था|
मेरी बचपन की स्मृतियों में एक मीठी याद यह भी है कि जब भी मैं ज़िद्द करती तो अपनी प्यारी ‘बेबे’ से बुग्दियाँ माँगती थी कि मुझे उनके साथ खेलना है| हम ‘बेबे’ को तंग भी करते थे कि अपनी बुग्दियों को किसको देकर जाएँगी| वो हँसकर कभी भी हम भाई बहनों का नाम ले लेती थी| मैंने इस प्रकार की माला सुनारों की दुकानों में कुछ वर्ष पहले तक तो देखी हैं लेकिन अब दिखाई नहीं देती|
मैं जब भी आँख बंद कर के अपने बचपन में लौटती हूँ तो मुझे बेबे की वो बुग्दियाँ बहुत याद आती हैं| मैं इस अनमोल गहने को डुग्गर संस्कृति के साथ ही जोडती हूँ|
खेद है कि मेरे पास सोने में जड़ी बुग्दियों की माला की कोई तस्वीर नहीं है और न ही किसी डोगरी महिला के गले में सजी बुग्दियों की कोई तस्वीर| यह गुज्जर युवती का तस्वीर मैंने गूगल में ढूँढी है| अपने सभी डोगरी- हिमाचली मित्रों से अनुरोध है कि आपके पास अगर कोई ऐसा चित्र है तो उसे इसे पोस्ट के साथ जोड़ें| अगर ‘बुग्दियों’ के विषय में कोई ओर जानकारी है तो उसे भी लिखें| आभारी रहूँगी|  
शशि पाधा
6 फरबरी, २०१८


रविवार, 4 फ़रवरी 2018

हमारी धरोहर ----डोगरी पोशाक--------
मेरे बहुत से मित्रों ने मुझसे पूछा है कि 'डोगरी पोशाक' पंजाबी पोशाक से भिन्न कैसे है या कितनी भिन्न है | मुझे इस विषय में जितनी भी जानकारी है उसे आपके साथ साझा कर रही हूँ | पंजाब में पहले सलवार कमीज़ ही पहनी जाती थी किन्तु जम्मू में डोगरी महिलाएँ कलियों वाला कुर्ता और सुत्थन पहनती थीं | 'सुत्थन' साठ के दशक में फैशन में आया चूडीदार के समान ही है केवल सुत्थन में चूड़ियाँ बहुत होती थी| सुत्थन धारी दार भी होती थी जो मोटी सिल्क में बनती थी, उस कपडे़ को ‘गुलबदन’ कहा जाता था ।हमारी दादी, परदादी और शायद उससे भी पहले डोगरी महिलाएँ केवल यही पोशाक पहनती थीं | मेरी दादी सास साठ के दशक में जब दिल्ली में रहने गईं तो यही पहनती थीं | उनको देख कर नवयुवतियाँ मेरी चाची सास से कहती थीं कि आपकी सास बहुत फैशनेबल है | कुर्ता शनील, प्लश का होता था और गर्मियों के लिए मलमल के कपड़े को रंग कर बनाया जाता था। समारोहों या विवाह शादियों में पहनने के लिए इसमें गोटा -किनारी का प्रयोग किया जाता था| कुर्ता और सुत्थन भिन्न रंगों की होती थी यानी contrast. आज का कुर्ता- पाजामा बहुत बाद फैशन में आया | मैं बहुत भग्यशाली हूँ कि मेरे पास मेरी माँ की और मेरी सासु माँ की डोगरी पोशाक है जो मैं कभी कभी त्योहारों पर पहन लेती हूँ | मेरी बहुओं और पोतियों के पास भी है जो बड़े चाव से इसे पहनती हैं | अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेज के रखना हमारा कर्तव्य है | मैं अपने परिवार की कुछ डोगरी पोशाकों को आप के साथ साझा कर रही हूँ | मेरा विनम्र निवेदन जम्मू की लड़कियों से है कि आप अगर इस पोस्ट में कुछ जोड़ना चाहती हैं तो स्वागत है | आप सब इसे पहनें और अगली पीढ़ी के लिए अवश्य बनवा दें |
शशि पाधा
                                                 एक अंतहीन प्रेम कथा


“ मेरा हिन्दोस्तानी होना सिर्फ एक अहसास ही नहीं मेरी पहचान है
और मेरा भारतीय सैनिक होना सिर्फ एक काम ही नहीं
मेरा धर्म है, मेरा मान है ”
यह उद्गार है, परमवीर योद्धा लांस नायक मोहन गोस्वामी के | ये भारतीय सेना की महत्वपूर्ण यूनिट ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ के अविस्मरणीय योद्धा थे | इन्हे 26 जनवरी २०१६ के स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर उनकी वीरता तथा महाबलिदान के लिए सर्वोच्च सम्मान ‘अशोक चक्र’ से विभूषित किया था |
उद्घोषक, लांस नायक मोहन गोस्वामी के अदम्य साहस और शौर्य का वर्णन करते हुए बोल रहे थे, “ इस शूरवीर सैनिक ने केवल 10 दिनों में 11 आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया | 2 और 3 सितंबर 2015 की रात को लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरूदा जंगल में घात लगाने वाले दस्ते में शामिल थे। रात आठ बजकर 15 मिनट पर चार आतंकवादियों के साथ उनकी भीषण मुठभेड़ हुई। इसमें उनके दो साथी घालय होकर गिर पड़े। लांस नायक मोहन दो साथियों के साथ अपने सहयोगियों को बचाने के लिए आगे बढ़े। जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि आगे बढ़ने में उनके जीवन को खतरा है। लांस नायक मोहन ने पहले एक आतंकवादी को मार गिराने में मदद की । उसके बाद अपने तीन घायल साथियों की जिंदगी पर आसन्न खतरे को भाँपते हुए, अपनी निजी सुरक्षा की परवाह न कर के बचे हुए आतंकवादियों पर टूट पड़े| दोनों ओर से भयंकर फायरिंग हुई |आतंकवादियों की गोली उनकी जांघ में लगी लेकिन उसे नज़र अंदाज़ करते हुए उन्होंने एक आतंकवादी को मार गिराया और दूसरे को घायल कर दिया। अचानक उनके पेट में एक गोली लगी। अपने गंभीर घावों के बावज़ूद मोहन नाथ ने बचे हुए अंतिम आतंकवादी को दबोच लिया और उसे मार गिराया। इस अभियान मेंलांस नायक मोहन नाथ ने न केवल दो आतंकवादियों को मार गिराया, बल्कि अन्य दो को निष्क्रिय करने में भी सहायक हुए और अपने तीन घायल साथियों की जान बचाई। अंत में अपने लक्ष्य की पूर्ति के बाद यह योद्धा सदा के लिए माँ भारती की गोद में सो गया| लांस नायक मोहन नाथ गोस्वामी ने व्यक्तिगत रूप से आतंकवादियों को मार गिराने और अपने घायल साथियों का बचाव करने में सहायता प्रदान करते हुए भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप अपना सर्वोच्च बलिदान दे कर विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन किया । आज कृतज्ञ राष्ट्र इन्हें इनकी अप्रतिम वीरता के लिए सर्वोच्च पदक से विभूषित करते हुए गौरवान्वित है|”
उद्घोषक के ओजपूर्ण स्वर में इस शौर्य गाथा को सुनते ही सारा आकाश करतल ध्वनि से गूँज उठा | इस पदक को उनकी पत्नी भावना गोस्वामी ने करतल ध्वनि की गूँज के मध्य नतमस्तक होकर ग्रहण किया |
मैं, समारोह का यह विवरण हज़ारों मील दूर बैठी अमेरिका में अपने टी वी स्क्रीन पर देख रही थी | भावविह्वल होकर मैंने कहा था, “ धीरज रखना बहन, मैं शीघ्र ही तुमसे मिलने आऊँगी |”
मेरा ममता से भरा हृदय उस समय उस दुबली-पतली लड़की को गले लगाने के लिए आतुर था |मुझे इस बात का अहसास था कि भारत के एक पहाड़ी नगर नैनीताल के पास बसे एक छोटे से गाँव ‘लालकुआँ’ में बैठी भावना मेरे अश्रुपूर्ण शब्द नहीं सुन रही है, किन्तु मुझे स्वयं से यह वायदा करके आन्तरिक सांत्वना मिली थी |
कुछ ही महीनों बाद जुलाई में ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ के ५०वें स्थापना दिवस के उत्सव में आई भावना से मिल कर खुद से किया यह वायदा पूरा हुआ ,इसकी मुझे प्रसन्नता हुई | उसे गले लगाते ही मैंने उसके सामने मन में उठते प्रश्नों की गठरी खोल दी थी |
मैंने कहा, “ भावना, मैं आपको तब से जानती हूँ जब मैंने टी वी स्क्रीन पर आपको राष्ट्रपति से अशोक चक्र एवं प्रशस्ति पत्र ग्रहण करते हुए देखा था | तब से मैं यही सोचती हूँ कि इतनी छोटी आयु, आगे की इतनी लम्बी जीवन डगर, कैसे, और किसके सहारे -------”
“ मैम, मैं आठ जन्म, आठ युग, आठ लोक, कहीं पर भी जन्म लूँ , मुझे उनके जैसा और कोई मिल नहीं सकता | मेरे हर एकाकी पल में वो मेरे साथ हैं | वही मेरा अतीत थे; वही मेरा वर्तमान हैं, और उनकी मधुर स्मृतियाँ ही मेरा भविष्य हैं | उनके सहारे ही जी रही हूँ |”
मैंने अभी सवाल पूरा भी नहीं किया था कि उसने बिना रुके, बिना साँस लिए मुझे उत्तर देना आरम्भ कर दिया था | यह संकल्प और निष्ठा से भरे हुए शब्द थे लांस नायक मोहन गोस्वामी की युवा पत्नी भावना गोस्वामी के | मोहन गोस्वामी को वीरगति प्राप्त हुए कुछ महीने ही हुए थे, शायद आठ महीने | मैं उससे कभी नहीं मिली थी, लेकिन यह जानती थी कि मोहन मेरे पति की पलटन ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ का एक शूरवीर सैनिक था | आज मैं और भावना दोनों आमने-सामने बैठे एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे |
उसका त्वरित उत्तर सुनकर मैंने बड़े प्यार से पूछा, “ भावना, यह आठ का आँकड़ा क्यूँ ?”
अब उसके होठों पर हल्की सी मुस्कराहट थी और उसकी बड़ी-बड़ी उदास आँखें अतीत की खोह में कुछ ढूँढ रही थी|
एक गहन उच्छ्वास लेते हुए वो बोली, “ मैंने मोहना के साथ आठ वर्ष का सुखद वैवाहिक जीवन बिताया है | |इन आठ वर्षों में मैंने जो भोगा-पाया, वो सुख मेरे लिए आठ जनमों की धरोहर है | वही जन्मों-जन्मों तक मेरा सम्बल है |”
मेरे सामने दुबली-पतली सी लड़की बैठी थी किन्तु उसके स्वर में वही ओज झलक रहा था जो आज की वीर नारी का सब से दृढ़ रक्षा कवच है | मुझे उसके स्वर में कहीं कोई कँपकपी, कोई घबराहट नहीं दिखी | मुझे लगा कि यही तो एक मुख्य लक्षण है जो वीर नारी को एक अलग पहचान देता है |
मैं श्रद्धा से उसे देख रही थी और वो अपने छोटे से वैवाहिक जीवन की प्रेम भरी गाथा सुना रही थी |
“ मैम, बहुत शरारती थे मोहना | मुझे बिना बताए ही वो छुट्टी आते और घर के दरवाज़े पर खड़े हो कर मुझे हैरान कर देते थे | आनन–फानन में छत पर खड़े होकर गाँव वालों को आवाजें लगा कर कहते थे – ‘चाची मैं आ गया, बुआ शाम का खाना आपके साथ !’ आस-पास के बच्चों के लिए भी उपहार लाते थे | सारे गाँव का ‘लाडला बेटा’ थे वे | इतनी मौज मस्ती करते थे कि गाँव वाले स्नेह से इन्हें ‘रौनकी’ नाम से बुलाते थे |”
भावना अपने बीते जीवन की मीठी यादों में खो गई थी और मैं उसके हाव-भाव, उसके शब्दों की मीठास में डूब रही थी | मोहन ने उसे किसी शादी में देखा था और उससे शादी का प्रस्ताव कर बैठा था, और उस दिन भी तारीख़ थी – आठ |
मैंने मोहन और भावना की एक सुंदर सी तस्वीर में भावना के गले में प्यारा सा मंगल सूत्र देखा था | मैंने पूछ लिया, “ तो वो मंगल सूत्र भी आठ धागों से पिरोया होगा ?”
हँस कर कहने लगी, “ नहीं मेम साब, वो तो इन्होने मुझे शादी की दूसरी साल गिरह पर पहनाया था | मैंने बहुत कहा था कि पहले घर बनवा लेते हैं फिर दूसरे खर्चे | पर कहाँ माने थे वो | लाकर पहना दिया था |”
आज वो मंगल सूत्र तो नहीं देखा किन्तु उसके स्थान पर पतले से काले धागे में पिरोई काले मनकों की माला थी | पहाड़ में मैंने बहुत सी लड़कियों को ऐसी माला पहने देखा है | अच्छा लगा कि उसका गला और कलाई सूनी नहीं थी |
मैंने सुना था कि मोहन अच्छा शायर भी था | उसकी इस खूबसूरत कला के विषय में मैंने भावना से पूछा, “ बहुत से गीत गाए होंगे उसने तुम्हारे लिए | गीतों में तुम्हें बहुत कुछ कह जाता होगा| अच्छा तो तुम्हारी किस चीज़ की वो सबसे अधिक प्रशंसा करता था ?”
पहली बार मुझे आभास हुआ कि वो थोड़ा झिझकी थी | कुछ पल चुप रही फिर हँस कर बोली, “ मेरी आँखें | कहते थे तेरी आँखों में कोई समन्दर है | तुम काजल मत लगाया करो |” मैंने उसकी आँखों में उमड़े पीड़ा के तूफ़ान को देख लिया था | इससे पहले कि वो किनारे तोड़ जाए मैंने जल्दी से पूछा, “ और तुम्हें ?”
बड़े कोमल भाव से उसने कहा, “ मुझे तो वो पूरे के पूरे ही अच्छे लगते थे | किस-किस की तारीफ़ करूँ ? वो हैं ही इतने अच्छे, थे |” वो अपने अतीत में खो गई थी और मैं उसे बाहर नहीं लाना चाहती थी | सुना था मीठी यादें ही दारुण पीड़ा की औषधि होती हैं | हम दोनों ही कमरे में चुप-चाप बैठे, मौन में उस पीड़ा की मरहम ढूँढ रहे थे |
अभियान से एक दिन पहले उसने अपनी डायरी में एक छोटी सी कविता लिखी थी – “ पत्नी के निस्वार्थ प्रेम की खुश्बू को महकता छोड़ के आया हूँ
मैं नन्हीं सी चिड़िया बेटी को चहकता छोड़ के आया हूँ
मुझे सीने से अपने तू लगा ले ऐ भारत माँ
मैं अपनी जन्मदायिनी माँ को तरसता छोड़ के आया हूँ ”
मैंने कई बार इन पँक्तियों को पढ़ा था | इन्हें भीतर तक महसूस करते हुए मैं यही सोचती थी कि 10 दिन में 11 खूँखार आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने वाले इस शूरवीर योद्धा के हृदय में और कितनी जगह होगी जहाँ शौर्य और पराक्रम की उद्दात भावना के साथ पति, पिता और सुपुत्र के मनोभावों की अविरल नदिया बहती रहती हो | मैं सदैव इस बात को मानती हूँ और अपने पाठकों को बताना चाहती हूँ कि सैनिक केवल ‘घातक’ नहीं होता | वह पति, पुत्र, मित्र, पिता, शायर, गायक, सेवक और अभिनेता भी होता है | वह ‘अर्जुन’ तब होता है जब उसे धर्म की रक्षा करनी होती है | वह धर्म चाहे राष्ट्र रक्षा हो, चाहे मानव रक्षा | उस समय वह रक्षक का चोला पहन कर अपना कर्तव्य निभाने चल पड़ता है |
“ शायरी के साथ-साथ और भी शौक होंगे मोहन को ?” मेरे पूछने पर बहुत संजीदगी से बताने लगी, “ डांस का बहुत शौक था | स्कूल में उनके अध्यापक बताते हैं कि हर कार्यक्रम में उनके डांस की एक आईटम अवश्य होती थी |”
अब तक भावना थोड़ी सहज हो गई थी | पास में बैठी थी उसकी छोटी सी बिटिया | मैंने उससे पूछा, “ बहुत सुंदर नाम है आपका ‘भूमिका’| किसने नाम रखा था आपका ?”
भूमिका ने बाल सुलभ भोलेपन से कहा, “ मेरे पापा ने | पर वो मुझे कभी गुड़िया और कभी चिड़िया ही बुलाते थे |”
हँसते हुए भावना बोली, “ बहुत सोच-विचार के बाद ही यह नाम चुना था मोहना ने | मेरे नाम का ‘भ’ और अपने नाम का ‘म’ जोड़ कर ही वो अपनी पहली सन्तान का नाम रखना चाहते थे |”
मैंने भी उत्सुकता वश पूछ लिया, “ और अगर लड़का होता तो ?”
बिना समय गँवाए उत्तर था , “ भौम या भीम |”
अब हम दोनों ही सहज होकर हँस रहे थे | स्वयं एक सैनिक पत्नी होने के नाते मैं वियोग की वेदना भोग चुकी थी | उस लम्बी और अनिश्चित अवधि में पत्र ही हमारा सहारा होते थे | अपने बीते कल को याद करते हुए मैंने भावना से पूछा, “ जब से देश की उत्तरी सीमाओं को आतंकवाद ने घेर रखा है, हमारी पलटन के सैनिक अधिकतर सीमाओं पर ही तैनात रहते हैं | ऐसे में बहुत कम समय के लिए ही तुम उनके साथ रह पाती होगी | केवल लम्बे-लम्बे पत्र ही तुम्हारा सम्पर्क सूत्र होंगे ?”
उसने बड़ी हैरानी से मेरी ओर देखा कि मैं कैसा सवाल कर रही हूँ, और फिर कहने लगी, “ मैम, पत्र कहाँ, आज कल तो WhatsApp , Messenger पर ही सारा पत्र व्यवहार होता है | कोई भी दिन खाली नहीं था जब ‘वे’ फेस टाइम पर या व्हट्स एप पर बात नहीं करते थे |”
मैं भी कितनी नादान थी | इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि मैं अपनी अगली पीढ़ी से बात कर रही थी | मैंने कुछ झिझकते हुए कहा, ‘ओह ! मैं तो भूल ही गई थी कि अब डाक से पत्र तो कोई भेजता ही नहीं है |”
इससे पहले कि मैं कुछ और पूछती वो बोली, “ उनके फोन की एक अलग से रिंग टोन मैंने सहेज रखी थी | आधी रात को भी फोन आता तो मैं उठा लेती थी |”
थोड़ी देर के लिए भावना चुप रही और फिर अपने पर्स से एक मोबाइल निकाला |
मोहना के फोन की रिंग टोन लगाई और बहुत अस्फुट स्वर में बोली, “ अब मैं खुद ही फोन करती हूँ और खुद ही सुनती हूँ |”
मैं थोड़ा काँप गई थी | इतनी बहादुर लड़की और भीतर से इतनी भावुक, इतनी कोमल | कैसे होंगे वो अंतहीन प्रतीक्षा के पल जब भावना केवल मोहन के फोन की घंटी ही सुनना चाहती होगी और फिर अपने को ही सुना कर मौन सांत्वना देती होगी !!
कुछ घंटे पहले यूनिट के वेलफेयर सेंटर के समारोह में भावना को सम्मानित करते हुए सूबेदार साहब की पत्नी ने कहा था , “ भावना बहुत बहादुर है | वह अपनी बच्ची को पढ़ा भी रही है और साइकोलोजी में एम ए भी कर रही है | साथ ही अपना घर भी बनवा रही है | ऐसी धैर्यवान और कर्मठ वीर नारी हम सब के लिए एक उदाहरण है |”
भावना ने मुझे यह भी बताया था कि मोहन उसे आगे पढ़ने के लिए बहुत उत्साहित करते रहते थे | स्वयं उन्होंने 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन उन्हें बहुत गर्व था कि भावना ग्रेजुएट थी |
मैं अब तक मोहन और भावना के छोटे से प्यार भरे जीवन के विषय में बहुत कुछ जान गई थी, किन्तु अनुभव यही कहता था कि कोई तो पल होगा जब भावना को मोहन की जीवन रक्षा के विषय में डर लगता होगा या आशंका होती होगी | सुदूर पहाड़ों में रहने वाली लड़की को कितना पता था कि जिस पलटन में मोहन सेवारत था उस पलटन को सदैव शत्रु के साथ आमने-सामने युद्ध करना पड़ता है | स्पेशल फोर्सेस में होने के कारण उनका हर अभियान, हर युद्ध ख़तरों से भरा होता है |
मैंने यही प्रश्न उससे पूछा, “ वे कभी आपसे अपने इस चुनौती पूर्ण व्यवसाय की बात करते थे | कभी बताते थे कि अभियान पर जाते हुए कितने खतरों का सामना करते हैं ?”
उसने बिना संकोच के कहा, “ वे हमें अपने काम के विषय में जितना आवश्यक था, उतना ही बताते थे | पता नहीं क्यूँ पर वो मुझे भविष्य के लिए सदैव तैयार करते रहते थे | अगर कभी मैं डरती थी तो कहते थे – मैं कमांडो हूँ , पूरे दस को लेकर जाऊँगा | अब सोचती हूँ कि क्या सभी सैनिक अपने परिवार को यूँ ही सचेत करते रहते हैं या इन्हें मेरी बहुत चिंता थी | पता नहीं, वही जानें |”
मोहन के सैनिक होने का गर्व जितना मोहन को था उतना ही भावना को भी | बताने लगी, “ मोहन कहते थे, बचपन से ही उन्हें कमांडो बनने का शौक था | उनके पिता भी भूतपूर्व सैनिक थे | इसीलिए सैनिक धर्म तो उन्हें जन्म घुट्टी में ही पिला दिया गया था | किन्तु कमांडो ही बनना है, यह जुनून तो विद्यार्थी जीवन में ही उनके मन-मस्तिष्क में छा गया था | सेना में भर्ती होने से पहले निर्भीक कमांडो बनने के लिए उन्होंने पूरी तैयारी कर ली थी |”
अचानक बात करते करते उसने मुझसे पूछा, “ मेम साब जी, क्या आप मोहना को जानती थीं , कभी उससे मिली थी ?”
मैंने बड़े स्नेह से उससे कहा, “ कभी नहीं मिली | पर एक बात कहूँ, पति के सेवा निवृत होने के बाद भी हमें अपनी पलटन से उतना ही प्यार, लगाव रहता है जितना नौकरी के समय था | हम हर पल उनसे सम्पर्क बनाए रखते हैं और जब भी समय मिलता है पलटन के सदस्यों से मिलने भी आते हैं | फिर दूरी कैसी ? इस नाते मैं मोहन को जानती थी | जिस दिन मोहन ने वीरगति प्राप्त की थी उस दिन मैंने विभिन्न समाचार पत्रों में उसकी तस्वीर देखी थी | एक तस्वीर में तुम और भूमिका भी उसके साथ थी | कितने खुश लग रहे थे आप तीनों | उसी दिन मैंने यह संकल्प लिया था कि तुमसे अवश्य मिलूँगी, कभी |”
अब मैं थोड़ी भावुक थी | मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर भावना मुझसे बोली, “ आप मेरी से बड़ी हैं | मेरी बेटी को आशीर्वाद दीजिए कि यह अपने पापा का नाम ऊँचा करे | मैं इसे डॉक्टर बनाना चाहती हूँ, सेना में भेजना चाहती हूँ | बस यही मेरा एक मात्र लक्ष्य है |”
मैंने उसके स्वर में जो संकल्प का घोष सुना उससे मुझे लगा कि सीमाओं पर शत्रु का संहार करने वाले शूरवीर अपनी वीरांगनाओं के इसी धैर्य और आस्था का संबल पाकर निश्चिन्त हो कर रक्षा कर्म में जुट पते होंगे |
अपनी बेटी की ओर देखती हुई भावना बोली,” इसके जन्म पर मुझे परिवार से काफी कुछ सुनना पड़ा था क्योंकि घर के बड़ों को पुत्र की चाह थी | पर अब मैं इससे ही अपना वंश चलाऊँगी, इसके नाम के साथ मोहन का नाम सदैव जुड़ा रहेगा |”
भावना के इस रूप को देख कर मुझे बहुत खुशी हो रही थी | किन्तु एक प्रश्न जो मेरे मन में अभी तक बैठा था, पर इतनी हंसती खेलती नवयुवती को मैं फिर से उस दारुण पल की याद नहीं दिलाना चाहती थी, फिर भी पूछ लिया, “ भावना आप को सूचना कैसे मिली ?
धरती पर आँखें गड़ाये दूर कहीं कुछ खोजती सी वो बोली, ” मुझे पता नहीं था कि वो किसी मिशन पर गए हैं | 11 अगस्त को ही तो गुड़िया का जनम दिन मना कर 15 अगस्त को गए थे | कुछ दिन फोन पर भी बात होती रहती थी | पिछले तीन दिनों से नहीं हुई थी | फिर एक दिन इनके दोस्त बार-बार फोन करके पूछ रहे थे कि भाभी आप कैसी हो ? मुझे नहीं पता था कि वो मुझे किसी अशुभ सूचना के लिए तैयार कर रहे थे | फिर शाम को ‘एस एम’ साहब का फोन आया था | कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह रहे थे | बस सुन्न सी मैं यही समझ सकी कि ----
अब वो चुप थी | पहली बार मैंने उसके शरीर में कंपन देखी थी | उसकी बच्ची चुपचाप अपनी माँ का हाथ लेकर उसे सहला रही थी | कितने असमय ही बड़े हो जाते हैं शहीदों के बच्चे ! कैसे समझ लेते हैं अपना उत्तरदायित्व !! मैंने उसके मौन को नहीं तोड़ा | उसकी आर्द्र आँखों की पीड़ा मेरी आँखों में भी प्रतिबिम्बित हो रही थी |
उसने गले में पतली सी माला पहन रखी थी जो शायद शादी के समय मोहन ने उसे पहनाई होगी | उसे बड़े प्रेम से छू कर बोली , “ यह है न उनका मेरे साथ होने का चिह्न | और फिर मैंने उनकी लैप टॉप, वर्दी , मोटर साइकल, फोन सभी चीजें सम्भाल कर रखी हैं |
मैंने वातावरण को थोड़ा सहज करते हुए पूछा, “ और उनकी शायरी वाली डायरी ? उसे तो तुम रोज़ पढ़ती होगी ?”
अब वो थोड़ा शर्मा गई थी | भावना ने बताया, “ हाँ पढ़ती हूँ ; कई बार, बार-बार | और फिर उनके मित्र भी मुझे उनका लिखा भेजते रहते हैं जो उन्होने पलटन में रहते हुए किसी नोटबुक में लिख छोड़ा होगा |”
फिर स्वयं ही कहने लगी, “ मैंने उनकी समाधि बनवाई है, घर के सामने अपनी ज़मीन पर | पहाड़ों में वीरों की समाधि बनवाने का भी प्रावधान है | वहीं पर एक छोटा सा मंदिर बनेगा | गाँव में उनके नाम की सड़क है, स्कूल है | स्टेडियम को भी उनका ही नाम दिया गया है | बहुत से लोग आते रहते हैं उस समाधि पर | कई संस्थाएँ भी मुझे बुलाती रहती हैं | सब से अधिक मैं जो काम कर रही हूँ वो यह है कि मैंने अन्य वीर नारियों से सम्पर्क बना लिया है | उनसे बातचीत करती रहती हूँ |
“और पलटन के साथ क्या सम्पर्क सूत्र है ?” मेरे यह पूछने पर कहने लगी,
“पलटन ही तो मेरा घर है | इन्होने ही तो मेरा घर बनवाने में मेरी सहायता की | फोन भी आते रहते हैं | आप इतनी दूर से मिलने आई हो, आप भी मेरी अपनी हो | मैं अकेली कहाँ हूँ ?”
बातों का सिलसिला तो कभी समाप्त नहीं हो सकता था किन्तु अभी और भी कार्यक्रम थे| मेरे मन में मोहन के उस महा अभियान के विषय में कई प्रश्न थे | इसीलिए हम दोनों फिर मिलने का वादा कर के विदा हुए | उसके जाने के बाद मैंने एक अजीब सा एकाकीपन महसूस किया | भावना के साथ मेरा एक अटूट संबंध जो जुड़ गया था |
दो जुलाई के दिन पलटन में कोई विशेष कार्यक्रम नहीं था | बस वो विदा लेने का दिन था | मैंने भी भावना और भूमिका से मिलने के लिए उन्हें अपने पास बुलाया था | हम तीनों सुबह-सुबह उस गौरवशाली वीर स्थली पर गए जहाँ यूनिट के अन्य तीन अशोक चक्र विजेता शहीदों के साथ मोहन की कांस्य मूर्ति स्थापित थी | उन पर चढ़ाई गई श्रद्धा सुमन से पिरोई मालाएँ अभी तक वातावरण को सुगन्धित कर रहीं थी | मैंने चुपचाप नतमस्तक हो कर उन वीरों को नमन किया | मेरे पास खड़ी भावना और भूमिका मोहन की मूर्ति को अपलक निहार रहीं थी | शायद उससे कुछ कह रही हों, अपने मन की बात | उस पल मैं सोच रही थी कि एक युवा पत्नी के मन में अपने शूरवीर पति की मूर्ति को देख कर क्या भाव उठ रहे होंगे ? वो कौन से मधुर पलों को याद कर ही होगी |? नन्हीं सी बिटिया क्या पूछ रही होगी अपने पिता से ? भावना तो शायद अपने अलौकिक प्रेम का कोई संदेश दे रही होगी किन्तु भूमिका ??? कौन जाने उसके भोले-भाले मन में कितने प्रश्न उठ रहे होंगे | वो तो आतंकवाद की घृणित परिभाषा भी नहीं जानती होगी | बड़ी होकर ही शायद समझ पाएगी अपने बहादुर पिता के महाबलिदान का संकल्प और लक्ष्य |
मैंने भावना से कहा, “ देखो तो सामने ही खड़ा है , तुम्हें कैसा लग रहा है ?”
भावना ने भी कुछ सहज भाव से उत्तर दिया, “ बिलकुल वैसे ही, जैसे वो ‘मेरे’ थे | वो तो सदा ही मेरे मन-मस्तिष्क में ऐसे ही रहेंगे, जनमों जनमों तक |”
मैं समझ गई थी कि भावना ने आठ जनमों की बात क्यूँ कही थी | ऐसे परमवीर की पत्नी होने का मान उसे मिला था और वो उस गौरव के साथ, अपनी बच्ची का पालन पोषण करते हुए जीना चाहती थी |हमने एक दूसरे के साथ फोन पर सम्पर्क रखने का वचन लिया और विदा ली |
मेरी दृष्टि अभी भी उस वीर स्थली पर टिकी थी यहाँ पर अपने सशक्त हाथों में शस्त्र थामे चार योद्धा भारत माँ की रक्षा के लिए समस्त राष्ट्र का उद्बोधन कर रहे थे | मैं लौट आई थी उस पावन स्थली से इस विश्वास के साथ कि केवल उत्तराखंड के लालकुंयाँ गाँव में ही नहीं, देश के कोने -कोने में शहीदों के ऐसे स्मारक बनें ताकि हमारा देश, आने वाली पीढ़ी शहीदों के महाबलिदान को सदियों तक न भूले |
शशि पाधा
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लांस नायक मोहन गोस्वामी की पत्नी भावना और बेटी भूमिका के साथ लेखिका |
लांस नायक मोहन गोस्वामी किसी अभियान से पहले |

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